सेवानिवृत्त न्यायाधीशों के लिए समान सेवानिवृत्ति लाभ: सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र को एक समान नीति बनाने का निर्देश दिया
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को दो सप्ताह के भीतर सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीशों एवं उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए एक समान सेवानिवृत्ति लाभ नीति की सिफारिश हेतु उच्चस्तरीय समिति गठित करने का निर्देश दिया है। न्यायालय ने कहा कि विभिन्न राज्यों में सुरक्षा, आवास, चिकित्सा एवं अन्य सुविधाओं में असमानता संवैधानिक समानता के सिद्धांत के अनुरूप नहीं है। समिति राष्ट्रीय स्तर पर समान दिशा-निर्देश तैयार करेगी तथा तीन माह के भीतर अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार और सर्वोच्च न्यायालय को सौंपेगी। यह निर्णय अनुच्छेद 14, न्यायपालिका की स्वतंत्रता तथा न्यायाधीशों की गरिमा सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
सर्वोच्च न्यायालय ने केंद्र सरकार को दो सप्ताह के भीतर एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने का निर्देश दिया है, जो भारत के सेवानिवृत्त मुख्य न्यायाधीशों तथा उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के लिए एक समान सेवानिवृत्ति लाभ (Uniform Post-Retirement Benefits Policy) की सिफारिश करेगी। न्यायालय ने कहा कि विभिन्न राज्यों में मिलने वाली सुविधाओं में असमानता संवैधानिक समानता (Constitutional Equality) की भावना के अनुरूप नहीं है।
न्यायालय के निर्देश का आधार
सर्वोच्च न्यायालय की पीठ ने पाया कि विभिन्न राज्यों में सेवानिवृत्त उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों को सुरक्षा, सरकारी आवास, चिकित्सा सुविधा, ड्राइवर, घरेलू सहायक एवं दूरसंचार सुविधाओं जैसे लाभ अलग-अलग स्तर पर दिए जाते हैं। न्यायालय ने माना कि समान संवैधानिक पद पर कार्य कर चुके न्यायाधीशों के साथ राज्य के आधार पर भिन्न व्यवहार उचित नहीं है। इसलिए पूरे देश के लिए एकरूप नीति (Uniform National Policy) आवश्यक है।
समिति का कार्य एवं उद्देश्य
केंद्र सरकार द्वारा गठित की जाने वाली समिति का उद्देश्य सेवानिवृत्ति लाभों के लिए राष्ट्रीय स्तर पर समान दिशा-निर्देश तैयार करना, राज्यों की वित्तीय व्यवस्था का मूल्यांकन करना तथा एक समान एवं न्यायसंगत नीति की अनुशंसा करना होगा। सर्वोच्च न्यायालय ने समिति को गठन के तीन माह के भीतर अपनी रिपोर्ट केंद्र सरकार और न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करने का निर्देश दिया है।
संवैधानिक एवं प्रशासनिक महत्त्व
यह निर्णय अनुच्छेद 14 (समानता का अधिकार), न्यायपालिका की स्वतंत्रता (Judicial Independence) तथा न्यायाधीशों की गरिमा (Judicial Dignity) से जुड़ा हुआ है। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि न्यायाधीशों को सेवा निवृत्ति के बाद भी उनकी संवैधानिक गरिमा और सुरक्षा के अनुरूप सुविधाएँ उपलब्ध कराई जानी चाहिए, ताकि न्यायपालिका की संस्थागत स्वतंत्रता एवं निष्पक्षता बनी रहे।
UPSC के लिए महत्त्व
यह विषय UPSC मुख्य परीक्षा (GS Paper-II) में न्यायपालिका की स्वतंत्रता, न्यायिक सुधार (Judicial Reforms), संघीय ढाँचा, केंद्र-राज्य संबंध एवं संवैधानिक संस्थाओं के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। प्रारंभिक परीक्षा में भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI), सॉलिसिटर जनरल, न्यायपालिका की संरचना तथा संवैधानिक प्रावधानों से संबंधित प्रश्न पूछे जा सकते हैं।