भारत में पॉलीमर मुद्रा की शुरुआत: RBI को ₹10 और ₹20 के पॉलीमर नोटों के परीक्षण की मंजूरी
भारत सरकार ने RBI को परीक्षण के लिए ₹10 और ₹20 मूल्यवर्ग के 100-100 करोड़ पॉलीमर बैंकनोट जारी करने की अनुमति दी है, ताकि उनकी टिकाऊपन, सुरक्षा और उपयोगिता का मूल्यांकन किया जा सके। पॉलीमर नोट विशेष प्लास्टिक-आधारित सामग्री से बने होते हैं, जो कागजी नोटों की तुलना में अधिक टिकाऊ, जलरोधक तथा नकली नोटों के विरुद्ध अधिक सुरक्षित होते हैं। सरकार ने स्पष्ट किया है कि पॉलीमर नोट कागजी मुद्रा का स्थान नहीं लेंगे और इनका डिजिटल भुगतान प्रणाली पर भी कोई प्रतिकूल प्रभाव नहीं पड़ेगा। भारत ने 2012 में भी इस पहल पर विचार किया था, जबकि ऑस्ट्रेलिया 1988 में पॉलीमर बैंकनोट अपनाने वाला पहला देश बना और आज लगभग 60 देशों में इनका प्रचलन है।
भारत सरकार ने भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) को ₹10 और ₹20 मूल्यवर्ग के 1-1 अरब (100 करोड़) पॉलीमर बैंकनोट परीक्षण के आधार पर जारी करने की अनुमति प्रदान की है। इन नोटों का उद्देश्य विभिन्न भौगोलिक एवं जलवायु परिस्थितियों में उनकी उपयोगिता, टिकाऊपन तथा सुरक्षा का आकलन करना है। परीक्षण सफल होने पर भविष्य में इनका व्यापक प्रचलन किया जा सकता है।
पॉलीमर बैंकनोट क्या हैं?
पॉलीमर बैंकनोट पारंपरिक सूती-कागज (Cotton Paper) के बजाय विशेष प्रकार की पॉलीमर (Plastic-based) सामग्री से बनाए जाते हैं। ये सामान्य कागजी नोटों की तुलना में अधिक टिकाऊ, जलरोधक, गंदगी-प्रतिरोधी तथा नकली नोटों के विरुद्ध बेहतर सुरक्षा सुविधाओं से युक्त होते हैं। इनकी लंबी आयु के कारण नोटों के बार-बार प्रतिस्थापन की आवश्यकता कम होती है।
RBI द्वारा पॉलीमर नोट लाने का उद्देश्य
RBI का प्रमुख उद्देश्य भारतीय मुद्रा प्रणाली को अधिक सुरक्षित, टिकाऊ एवं लागत-प्रभावी (Cost-effective) बनाना है। पॉलीमर नोटों के उपयोग से मुद्रा छपाई एवं प्रतिस्थापन पर होने वाले दीर्घकालिक व्यय में कमी आने की संभावना है। साथ ही, ये भारत जैसी विविध जलवायु परिस्थितियों में अधिक प्रभावी सिद्ध हो सकते हैं।
कागजी मुद्रा एवं डिजिटल भुगतान पर प्रभाव
सरकार ने स्पष्ट किया है कि पॉलीमर नोट कागजी मुद्रा का स्थान नहीं लेंगे, बल्कि दोनों प्रकार की मुद्रा समानांतर रूप से प्रचलन में रहेंगी। साथ ही, पॉलीमर नोटों के प्रयोग से डिजिटल भुगतान प्रणाली (UPI, IMPS, NEFT आदि) पर किसी प्रतिकूल प्रभाव की संभावना नहीं है, क्योंकि नकद एवं डिजिटल भुगतान दोनों एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं।
वैश्विक परिप्रेक्ष्य एवं भारत के पूर्व प्रयास
भारत ने पहली बार 2012 में पॉलीमर नोटों की योजना पर विचार किया था, किंतु तकनीकी एवं परिचालन संबंधी चुनौतियों के कारण इसे लागू नहीं किया जा सका। विश्व स्तर पर ऑस्ट्रेलिया (1988) पॉलीमर बैंकनोट अपनाने वाला पहला देश था। वर्तमान में कनाडा, सिंगापुर, मलेशिया, इंडोनेशिया, थाईलैंड, रोमानिया सहित लगभग 60 देशों में पॉलीमर बैंकनोट प्रचलन में हैं।
UPSC परीक्षा की दृष्टि से महत्व
यह विषय भारतीय अर्थव्यवस्था, मुद्रा प्रबंधन, केंद्रीय बैंक की भूमिका, वित्तीय प्रशासन एवं बैंकिंग सुधारों से संबंधित है। प्रारंभिक परीक्षा (Prelims) में RBI के कार्य, भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934, पॉलीमर बैंकनोट, मुद्रा सुरक्षा विशेषताएँ तथा विश्व के प्रमुख देशों द्वारा अपनाई गई मुद्रा प्रणालियों से प्रश्न पूछे जा सकते हैं। मुख्य परीक्षा (Mains GS-III) में मुद्रा प्रबंधन, नकली नोटों की रोकथाम, वित्तीय नवाचार, लागत दक्षता तथा नकद एवं डिजिटल अर्थव्यवस्था के संतुलन के संदर्भ में इसका विश्लेषण महत्वपूर्ण हो सकता है।