SBI का बेसल-III अनुरूप AT-1 परपेचुअल बॉन्ड: बैंकिंग पूंजी सुदृढ़ीकरण की दिशा में महत्वपूर्ण पहल
भारतीय स्टेट बैंक (SBI) वर्ष 2026 में बेसल-III अनुरूप AT-1 परपेचुअल बॉन्ड जारी करने वाला पहला भारतीय बैंक बनेगा, जिसके माध्यम से वह ₹5,000 करोड़ जुटाने की योजना बना रहा है। AT-1 परपेचुअल बॉन्ड ऐसे पूंजी साधन हैं जिनकी कोई निश्चित परिपक्वता नहीं होती और नियामकीय स्वीकृति के बाद इनमें कॉल ऑप्शन के तहत बैंक इन्हें वापस खरीद सकता है। यह पहल बैंकों की पूंजी पर्याप्तता, जोखिम प्रबंधन और वित्तीय स्थिरता को मजबूत करने वाले बेसल-III मानकों के अनुरूप है। SBI ने वित्त वर्ष 2026-27 में इन्फ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड, AT-1 और टियर-II बॉन्ड सहित विभिन्न साधनों के माध्यम से ₹60,000 करोड़ तक पूंजी जुटाने की योजना बनाई है।
भारतीय स्टेट बैंक (SBI) वर्ष 2026 में बेसल-III (Basel III) मानकों के अनुरूप एडिशनल टियर-I (AT-1) परपेचुअल बॉन्ड जारी करने वाला पहला भारतीय बैंक बनने जा रहा है। इस निर्गम के माध्यम से SBI ₹5,000 करोड़ जुटाने की योजना बना रहा है। यह बैंक की पूंजी सुदृढ़ करने तथा दीर्घकालिक ऋण वृद्धि को समर्थन देने की व्यापक रणनीति का हिस्सा है।
AT-1 परपेचुअल बॉन्ड क्या हैं?
AT-1 (Additional Tier-I) परपेचुअल बॉन्ड ऐसे पूंजी साधन (Capital Instruments) हैं जिन्हें बैंक बेसल-III नियामकीय ढाँचे के तहत जारी करते हैं। इनकी कोई निश्चित परिपक्वता (Maturity) नहीं होती, इसलिए इन्हें Perpetual Bonds कहा जाता है। इनमें सामान्यतः Call Option होता है, जिसके तहत नियामकीय स्वीकृति मिलने पर बैंक एक निश्चित अवधि (जैसे 5 वर्ष) के बाद इन बॉन्डों को वापस खरीद सकता है।
बेसल-III का उद्देश्य और महत्व
Basel III वैश्विक बैंकिंग नियामक मानकों का एक ढाँचा है, जिसे बेसल समिति (Basel Committee on Banking Supervision - BCBS) ने 2008 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद विकसित किया। इसका उद्देश्य बैंकों की पूंजी पर्याप्तता (Capital Adequacy), जोखिम प्रबंधन, तरलता (Liquidity) और वित्तीय प्रणाली की स्थिरता को मजबूत करना है, ताकि आर्थिक संकट के समय बैंक अधिक सक्षम बने रहें।
SBI की पूंजी जुटाने की रणनीति
SBI के निदेशक मंडल ने वित्त वर्ष 2026-27 के दौरान विभिन्न ऋण साधनों के माध्यम से ₹60,000 करोड़ तक जुटाने की मंजूरी दी है। इसमें इन्फ्रास्ट्रक्चर बॉन्ड, AT-1 बॉन्ड और टियर-II बॉन्ड शामिल हैं। इसका उद्देश्य बैंक की पूंजी स्थिति मजबूत करना, नियामकीय आवश्यकताओं को पूरा करना तथा भविष्य में ऋण वितरण क्षमता का विस्तार करना है।
UPSC Perspective: आर्थिक एवं नियामकीय महत्व
यह पहल भारत के बैंकिंग क्षेत्र में पूंजी पर्याप्तता, वित्तीय स्थिरता, सार्वजनिक क्षेत्र के बैंकों के सुदृढ़ीकरण तथा वैश्विक बैंकिंग मानकों के अनुपालन को दर्शाती है। साथ ही यह विषय बैंकिंग सुधार, वित्तीय बाजारों के विकास तथा RBI की नियामकीय भूमिका से भी संबंधित है, जो UPSC की दृष्टि से महत्वपूर्ण है।